विवेक चतुर्वेदी
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झुक गया है गुलमोहर बाम तक
खबर आएगी देखना शाम तक।
खास – खास में ही ‘खास’ बॅंट गया
आम आया ही कहाॅं है ‘आम’ तक ।
साॅंस में जिनकी खुशबू से हम होते थे
जबॉं पे आता भी नहीं अब नाम तक ।
बैठ दिल्ली में दस बीस मुॅंह चलाते हैं
मरने जाता है एक फौजी लाम तक।
शेख साहब जरा उड़ेल दो तो मीना
तौबा हो जाए न अगले जाम तक।
हम काकरोच हैं बहुत पुराने हैं
रहेंगे क़ायम और इख्ति़माम तक।।
इख्ति़माम – समापन
