पर्यावरण और हम
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छवि गौर
प्रकृति ने तमाम जीवों को आत्मरक्षा के लिए प्राकृतिक हथियार उपलब्ध कराए हैं लेकिन संपूर्ण जगत में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसके नाखूनों में भी इतनी शक्ति नहीं कि वह किसी जीव के प्राण ले सके,
उसे प्रकृति ने केवल बोद्धिक बल प्रदान किया है ,और इसी कारण वह आज पृथ्वी का सबसे सशक्त प्राणी है ,
लेकिन इसी बुद्धि ने उसे अहंकार भी दिया है,कि वह प्रकृति पर विजय प़ाप्त करना चाहता है ,और इसे वह अपनी प्रगति समझने लगा है ।
नतीजा प़कृति का असीमित दोहन,कहते हैं कि यदि जोड़ा न जाए तो एक दिन कुबेर का खजाना भी खाली हो जाता है
हमने प्रकृति से लिया ही लिया है उसे वापस करने का कभी विचार भी नहीं किया ।
प्रगति के नाम पर हमने आकाशीय ओज़ोन परत को छलनी कर डाला, पहाड़ों का सीना चीर डाला, समुद्र में जहर घोल दिया, जंगलों को साफ किया, और जगह-जगह कांक्रीट के जंगल खड़े कर दिए, फैक्ट्रियों से लगातार धुआँ उगला,अणु और परमाणु बमों से धरती और समुद्र के गर्भ चीर दिए, जब प्रकृति के सभी अंगो पर लगातार बलात्कार कर ही लिया उसका संतुलन नष्ट ही कर दिया तो उसका भी धैर्य अब जवाब दे चुका है तो अब उसका कोप भी सहन करना पड़ रहा है।
वायुमंडल प्रदूषित है,जल प्रदूषित, खाद्य सामग्री प्रदूषित,है तो अब सारा विश्व उसके प्रकोप से संत्रस्त है ।
अब पर्यावरण शुद्धि पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विचार तो हो रहा है मगर प्रयत्न सतही हैं कोई देश अपना स्वार्थ त्यागने को तैयार नहीं है।
यदि हम केवल भारत की ही बात करें तो हमारे यहां प्राकृतिक संतुलन पर वेद काल से ही जागरूकता रही इसलिए कुछ कहना इस लेख का विषय नहीं है, हमारा देश एक कृषि प्रधान देश रहा है, यही कारण है कि भारत विश्व व्यापी मंदी का दौर आसानी से झेल गया लेकिन आज प्रगति की अंधी दौड़ में कृषि भूमि का विस्तार होने की बजाय रकबा कम होता जा रहा है और जन संख्या बढती ही जा रही है।
किसान अब भू मालिक के बजाय नौकरियों की ओर आकृष्ट है, वह तेजी से जमीनें बेच रहा है जहां कालोनियां, माल्स,और औद्योगिक कारीडोर्स बन रहे हैं, जंगल कम होते जा रहे हैं, जंगली जानवरों ने शहरों में गश्त लगाना शुरू कर दिया है हमने उनके प्राकृतिक आवास छीन लिए, वे मजबूर हैं।
सन ६०-७०के दशक में सुन्दर लाल बहुगुणा ने चिपको आन्दोलन के माध्यम से वृक्षों की सुरक्षा पर बल दिया कुछ अन्य पर्यावरण विदों ने नदियों आदि पर भी ध्यान दिया, पर सच तो यह है कि जिस व्यापक रूप से कार्य किया जाना चाहिए था उसे कभी गंभीरता से नहीं लिया गया भाषणों, सेमिनारों में ही चिन्ता व्यक्त होती रही, शहरों में अपने परिसरों में, पार्कों में पौधारोपण कार्यक्रम कर फोटो सेशन कर हम समझते हैं बड़ा काम किया है, वृक्षारोपण जंगलों नदियों के किनारों पर पहाड़ों पर आवश्यक है , कारखानों का प्रदूषण रोकना होगा, वैज्ञानिक प्रयोग जिनसे पर्यावरण को हानि होती है सीमित करने होंगे, पर आज की अंधी पूंजीवादी दौड़ में क्या यह संभव होगा?
प्रकृति अब विनाश को निमंत्रण दे रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, सुनामियां आ रही है, बादल फट रहे हैं, वर्षा अनियंत्रित हैं, पहाड़ कहीं धंस रहे हैं, कहीं स्खलित हो रहे हैं, भूमण्डलीय तापमान बढ़ने से जंगल जलने लगे हैं, सुप्त ज्वालामुखी कहीं कहीं सक्रिय हो रहे हैं, हिमालय करवट ले रहा है, अभी प्रारंभ है आने वाला समय और भयावह है, समुद्र सीमोल्लंघन को बेचैन है, यदि ऐसा हुआ तो बड़े बड़े महानगर तो क्या देश के देश जलमग्न हो कर समुद्र के गर्भ में समा जाएंगे तब प्रकृति का रौद्र तांडव संभले नहीं सम्हलेगा इन संकेतों पर गंभीरता से गौर नहीं किया गया तो यह कथित प्रगति संपूर्ण मानवजाति के विनाश का कारण बनेगी।
अतः समय रहते यह आवश्यक है कि कि हम सजग हों प्रकृति से छेड़छाड़ कम करते हुए उसके दोहन के पूर्व पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से पहले उससे लिया क़र्ज़ चुकाएं और प्रगति के रथ की गति की वल्गाएं कसें संभव हो तो कुछ समय विश्राम दें तभी कुछ सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं अन्यथा प्रकृति अब क्षमा के मूड में नहीं है I
