लंबे राजनीतिक सफर पर निकले डॉ. मोहन यादव
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पंच परिवर्तन : सादगी, सुशासन और पर्यावरण का प्रतिमान, संगठन और नेतृत्व से तालमेल की नई मिसाल
प्रसंगवश
डॉ. दीपक राय
मध्यप्रदेश की राजनीति में सादगी, सीधापन, सुशासन और जनता से सीधे जुड़ाव की जब भी बात होगी, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के काम करने के तरीके को हमेशा याद किया जाएगा। हाल ही में उन्होंने अपने सरकारी काफिले में बिना किसी तड़क-भड़क के एक इलेक्ट्रिक गाड़ी (ईवी) को शामिल कर न सिर्फ देश के सामने एक नई मिसाल पेश की है, बल्कि ऐसा करने वाले वे देश के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं। इस कदम के जरिए उन्होंने न केवल फालतू खर्चों को रोकने का संदेश दिया, बल्कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऊर्जा बचाने के आह्वान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ अभियान (जिसमें पर्यावरण बचाना एक मुख्य लक्ष्य है) को जमीन पर उतारने का काम किया है। डॉ. मोहन यादव का यह रूप केवल दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि यह उनके उस सरल स्वभाव का हिस्सा है, जिसे उन्होंने अपने निजी और राजनीतिक जीवन में हमेशा बनाए रखा है।

अक्सर देखा जाता है कि बड़े पद पर पहुंचने के बाद नेताओं और उनके परिवारों का रहन-सहन पूरी तरह बदल जाता है। बड़ी गाड़ियां, वीआईपी ट्रीटमेंट और सुख-सुविधाओं का फायदा उठाना एक आम बात हो जाती है, लेकिन डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में इस पुरानी सोच को पूरी तरह बदल दिया है। मुख्यमंत्री आवास (सीएम हाउस) में रहते हुए उन्हें ढाई साल के करीब का समय बीत चुका है, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने परिवार को सत्ता के इस बड़े केंद्र में लाकर नहीं रखा। एक बेहद दिलचस्प और प्रेरणा देने वाली बात यह भी है कि उनका छोटा बेटा खुद राजधानी भोपाल से ही डॉक्टर की पढ़ाई कर रहा है। वह चाहता तो मुख्यमंत्री निवास की तमाम सुख-सुविधाओं और सुरक्षा के बीच रहकर अपनी पढ़ाई कर सकता था, लेकिन वह आज भी एक सामान्य छात्र की तरह हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा है। पहले ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जब मुख्यमंत्रियों के पूरे परिवार और नाते-रिश्तेदार सीएम हाउस में ही रहने लगते थे, लेकिन डॉ. यादव ने यह साफ कर दिया कि मुख्यमंत्री का पद जनता की सेवा के लिए है, परिवार के ऐश-ओ-आराम के लिए नहीं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की यह सादगी उनके पारिवारिक और सामाजिक कामों में भी साफ दिखाई देती है। उन्होंने अपने बच्चों की शादियों के मौकों पर जो फैसले लिए, वे आज की राजनीति में बहुत कम देखने को मिलते हैं। जब वे नए-नए मुख्यमंत्री बने थे, तब उनके बड़े बेटे की शादी तय हुई थी। मुख्यमंत्री होने के नाते वे चाहते तो एक बहुत बड़ी और शाही शादी कर सकते थे, जिसमें देश भर के बड़े-बड़े लोग शामिल होते। लेकिन उन्होंने बिना किसी तड़क-भड़क और दिखावे के राजस्थान के एक मंदिर में बेहद कम मेहमानों के बीच अपने बड़े बेटे की शादी सादगी से की। इसी तरह, उन्होंने अपने छोटे बेटे की शादी के लिए उज्जैन में एक सामूहिक विवाह सम्मेलन को चुना। एक राज्य का मुख्यमंत्री अपने बेटे की शादी आम लोगों के साथ सामूहिक सम्मेलन में कर दे, यह समाज को एक धागे में पिरोने और सादगी का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने कभी भी अपने दोनों बेटों और बेटी को किसी भी सरकारी या निजी कार्यक्रम में इस तरह आगे नहीं आने दिया जिससे यह लगे कि वे मुख्यमंत्री के बच्चे हैं। उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा जमीन से जुड़े रहने और आम नागरिक की तरह जीने की सीख दी है।
कमल की बात यह है कि जब आजकल अधिकांश बड़े नेता अपने बेटा और बेटियों को नेतागिरी में लाकर बड़े पद दिलाने की लालसा में जुटे रहते हैं ऐसे में मोहन यादव ने अपने बच्चों को राजनीति से दूर रखा है।
इस सादगी के साथ-साथ मुख्यमंत्री का हालिया फैसला देश और दुनिया की एक बड़ी जरूरत से जुड़ा हुआ है। अपने काफिले में इलेक्ट्रिक गाड़ी को शामिल करना सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण को बचाने के प्रति उनकी गंभीर सोच को दिखाता है। आज जब पूरी दुनिया बढ़ते प्रदूषण और मौसम के बदलते मिजाज से परेशान है, तब एक मुख्यमंत्री द्वारा इलेक्ट्रिक गाड़ी चुनना समाज को साफ-सुथरी ऊर्जा अपनाने के लिए प्रेरित करता है। यह कदम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उन बातों के भी अनुकूल है जो समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने की बात करती हैं। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार की जा रही बिजली और ऊर्जा बचाने की अपील को डॉ. यादव ने बहुत गंभीरता से लिया है। यह दिखाता है कि वे संगठन और केंद्रीय नेतृत्व की बातों को केवल सुनते नहीं हैं, बल्कि उन्हें सच करके दिखाते हैं। संगठन और सरकार के बीच का यह बेहतर तालमेल डॉ. मोहन यादव की भविष्य की एक लंबी और मजबूत राजनीतिक पारी की ओर साफ इशारा करता है।
कुछ लोग भले ही इस सादगी को केवल राजनीति या दिखावा कह सकते हैं, लेकिन सच को छिपाया नहीं जा सकता। डॉ. मोहन यादव का यह सरल रूप कोई नया या मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनाया गया तरीका नहीं है। उज्जैन की जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि जब वे मुख्यमंत्री नहीं थे, और केवल एक विधायक या मंत्री के रूप में काम कर रहे थे, तब भी वे बेहद आसानी से बिना किसी सुरक्षा तामझाम के उज्जैन की गलियों में पैदल ही निकल जाया करते थे। आम लोगों से गले मिलना, चाय की दुकान पर बैठकर बातें करना और कार्यकर्ताओं के सुख-दुख में सीधे शामिल होना उनकी आदत रही है। आज मुख्यमंत्री पद की बड़ी जिम्मेदारियों और कड़क सुरक्षा के बीच भी उन्होंने अपनी उस पुरानी सरलता को खोने नहीं दिया है।

एक नेता जब अपनी जिंदगी को आम जनता जैसा रखता है, तो वह जनता का केवल नेता नहीं रह जाता, बल्कि उनका अपना चहेता और जनप्रिय नेता बन जाता है। डॉ. मोहन यादव ने अपने फैसलों से यह साबित किया है कि अच्छी बातों को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में लाना पड़ता है। काफिले में इलेक्ट्रिक गाड़ी का आना, बच्चों की शादियों को दिखावे से दूर रखना और परिवार को वीआईपी सुखों से दूर एक सामान्य जीवन जीने देना- ये सभी बातें मिलकर डॉ. मोहन यादव की एक ऐसी छवि बनाती हैं जो देश के दूसरे नेताओं के लिए भी एक सीख है। सही मायने में जनता का राज वही है जहां सरकार के फैसले लोगों की भलाई के लिए हों और नेता का जीवन समाज को सही रास्ता दिखाने की प्रेरणा बन सके।
