गौरिहार मंदिर की दीवार ध्वस्तीकरण मामला बनता जा रहा प्रशासन के गले की फांस
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चित्रकूट – प्राचीन धरोहर श्री गौरिहार मंदिर प्रकरण में एक नया और अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2005 में पंचम अपर जिला न्यायाधीश, सतना द्वारा गौरिहार मंदिर एवं अयोध्यावासी मंदिर से संबंधित वाद में स्थायी निषेधाज्ञा पारित की गई थी। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि प्रतिवादीगण मंदिर की संपत्ति, प्रबंधन, पूजा-पाठ एवं आय में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे और न ही कोई अधिकार उत्पन्न करेंगे।
और भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस निर्णय के विरुद्ध प्रतिवादी पक्ष उच्च न्यायालय गया अवश्य, किंतु बताया जाता है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी उस प्रकरण की सुनवाई का क्रमांक नहीं आ सका। यदि अभिलेखों में यही स्थिति है और कोई प्रभावी स्थगन आदेश अस्तित्व में नहीं है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि निचली अदालत के आदेशों और मंदिर के विधिक इतिहास का समुचित परीक्षण किए बिना इतनी बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई कैसे कर दी गई?
यही वह प्रश्न है जो अब गौरिहार मंदिर प्रकरण को केवल ध्वस्तीकरण के विवाद से आगे ले जाकर प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में खड़ा कर रहा है।
उधर उच्च न्यायालय में भी यह मामला लगातार गंभीर होता दिखाई दे रहा है।
फोरलेन निर्माण के दौरान 1706 में निर्मित गौरिहार मंदिर की दीवारों को क्षतिग्रस्त किए जाने के मामले में न्यायालय पहले ही तीखी टिप्पणियां कर चुका है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने पूछा था—
“मंदिर पहले बना या सड़क पहले निकली?”
और फिर एक ऐसा प्रश्न किया जिसकी गूंज आज भी चित्रकूट की गलियों में सुनाई दे रही है—
“तुम्हें 200 साल से ज्यादा पुराना मंदिर दिखाई नहीं दिया?”
यह प्रश्न किसी एक अधिकारी से अधिक उस सोच से था, जो विकास और विरासत के बीच संतुलन स्थापित करने में असफल दिखाई देती है।
जब गौरिहार मंदिर के समीप बुलडोजर पहुंचा, तब संत समाज रामधुन करते हुए उसके संरक्षण के लिए धरने पर बैठ गया। महंत रूप नारायण जी ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अंततः न्यायालय के हस्तक्षेप से कार्यवाही पर रोक लगी। किंतु तब तक मंदिर का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो चुका था।
बाद में न्यायालय ने प्रशासन को क्षतिग्रस्त भाग के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। किंतु चित्रकूट में चर्चा का विषय यह भी बना कि आदेश के अनुपालन के नाम पर कहीं प्लास्टिक के पाइप और कहीं हरी पन्नी का सहारा लेकर संरक्षण का प्रयास किया गया। इससे लोगों के मन में यह प्रश्न और गहरा हुआ कि क्या तीन शताब्दियों पुरानी धरोहरों के संरक्षण का यही मानक है?
गौरिहार मंदिर केवल पत्थरों का समूह नहीं है।
यह चित्रकूट की साधना परंपरा का साक्षी है।
यह संतों की तपस्या का प्रतीक है।
यह उस सांस्कृतिक धारा का जीवंत प्रमाण है जो सदियों से चित्रकूट की पहचान रही है।
इसी कारण आज यह मामला केवल एक मंदिर की दीवार का नहीं रह गया है।
यह न्यायालयीन आदेशों की मर्यादा, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और आस्था के सम्मान का विषय बन चुका है।
और अब जब पुराने न्यायालयीन अभिलेख एक-एक कर सामने आ रहे हैं, तो प्रश्न पहले से अधिक गंभीर हो गए हैं।
यदि न्यायालयीन आदेश मौजूद थे, यदि मंदिर का इतिहास सर्वविदित था, यदि संत समाज लगातार आपत्ति जता रहा था, तो फिर बुलडोजर गौरिहार मंदिर तक पहुंचा कैसे?
संभवतः आने वाले दिनों में इसी प्रश्न का उत्तर इस पूरे प्रकरण की दिशा और दशा तय करेगा।

जावेद मोहम्मद विशेष संवाददाता भारत विमर्श चित्रकूट मध्य प्रदेश।
