मंच पर धधकी ‘राख’, दंगों की आग और इंसानियत के सवालों ने दर्शकों को झकझोरा
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सांप्रदायिक हिंसा और इंसानियत के सवालों को नाटक ‘राख’ के जरिए मंच पर किया गया उजागर
समकालीन एक्टिंग-कंटेम्पररी वर्कशॉप के समापन पर कलाकारों ने सांप्रदायिक हिंसा, मीडिया और भीड़ मानसिकता की भयावह तस्वीर की पेश
भोपाल – उत्कल भवन के मंच पर अंधेरा छाता है, धीमी रोशनी के बीच एक मां अपनी खोई बेटी को पुकारते हुए मंच के एक कोने से दूसरे कोने तक भटकती है। कहीं चीखें सुनाई देती हैं, तो कहीं भीड़ के शोर में इंसानियत दबती नजर आती है। दर्शकों के सामने ऐसा माहौल बनता है मानो वे किसी नाटक को नहीं, बल्कि दंगों की भयावह सच्चाई को अपनी आंखों के सामने घटित होते देख रहे हों। राजधानी भोपाल में बुधवार शाम समकालीन थिएटर वर्कशॉप के समापन अवसर पर नाटक ‘राख’ का मंचन इसी संवेदनशील और तीखे अंदाज में किया गया।

बॉडी
कीर्ति बैले एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स द्वारा तैयार इस प्रस्तुति ने सांप्रदायिक हिंसा, भीड़ मानसिकता, मीडिया की भूमिका और लगातार खोती इंसानियत जैसे गंभीर मुद्दों को मंच पर जीवंत कर दिया। उत्कल भवन, जवाहर चौक में आयोजित इस कार्यक्रम में वर्कशॉप के प्रतिभागियों ने अपने अभिनय से दर्शकों को लंबे समय तक बांधे रखा। नाटक का निर्देशन श्रद्धा शालिनी मालवीय ने किया।
कार्यशाला के कलाकारों ने तैयार किया नाटक ‘राख’
प्रस्तुति की खास बात यह रही कि ‘राख’ किसी एक लेखक की लिखी पारंपरिक स्क्रिप्ट नहीं थी, बल्कि पूरी कार्यशाला के कलाकारों के अनुभवों, सवालों, डर और भावनाओं से मिलकर तैयार एक सामूहिक सृजन था। निर्देशक श्रद्धा शालिनी मालवीय के अनुसार कलाकारों ने अपने भीतर की संवेदनाओं को खुलकर साझा किया, जिन्हें जोड़कर यह प्रस्तुति तैयार की गई। उन्होंने बताया कि यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हर कलाकार की अपनी भावनात्मक यात्रा है, जो दर्शकों को भीतर तक सोचने के लिए मजबूर करती है।

दंगों और नफरत के बीच फंसे लोग…
नाटक की कहानी दंगों और नफरत के बीच फंसे लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है। मंच पर एक तरफ अपनी बेटी की तलाश में भटकती मां की बेबसी दिखाई देती है, तो दूसरी ओर पत्रकार और न्यूज एडिटर हिंसा को ‘खबर’ में बदलने की मानसिकता से जूझते नजर आते हैं। संवाद, प्रकाश व्यवस्था और मंचीय गतिविधियों के जरिए प्रस्तुति ने दर्शकों के सामने समाज का एक कड़वा सच रख दिया।
अगली आग कौन लगाएगा?
नाटक का अंतिम दृश्य सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ता है, जब मंच पर सन्नाटा पसर जाता है और कलाकार दर्शकों के सामने यह सवाल छोड़ जाते हैं कि “अगली आग कौन लगाएगा?” यही सवाल पूरे नाटक का सबसे बड़ा संदेश बनकर उभरता है। प्रस्तुति ने न केवल सांप्रदायिक हिंसा और भीड़ मानसिकता पर तीखा प्रहार किया, बल्कि यह भी दिखाया कि संवेदनहीन होती दुनिया में कला आज भी समाज को आईना दिखाने की ताकत रखती है।

भारत विमर्श भोपाल मध्य प्रदेश।
