सात दशक पूर्व हुई थी धारकुंडी आश्रम की स्थापना
1 min read
सतना – 22 नवंबर 1956, अगहन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी यही वह ऐतिहासिक तिथि है जब गुरु आज्ञा से परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज धारकुंडी पहुंचे थे। विंध्य क्षेत्र की बीहड़ पर्वतमालाओं और घने जंगलों के बीच स्थित अघमर्षण कुंड के समीप एक प्राकृतिक गुफा को उन्होंने अपनी साधना स्थली बनाया।
लोकमान्यताओं के अनुसार, उस गुफा में पहले एक खूंखार शेर का निवास था, लेकिन स्वामी सच्चिदानंद महाराज के वहां निवास करने के बाद शेर स्वतः ही गुफा छोड़कर चला गया। यही स्थान आगे चलकर धारकुंडी आश्रम के रूप में विकसित हुआ, जो आज आस्था और साधना का प्रमुख केंद्र है।
धारकुंडी क्षेत्र का उल्लेख महाभारत में वर्णित युधिष्ठिर-यक्ष संवाद से भी जुड़ा माना जाता है। प्राचीन काल में यह स्थान ऋषि वेद श्यांगक की तपोभूमि रहा है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां ध्यान करते ही मन स्वतः एकाग्र हो जाता है और आध्यात्मिक शांति की अनुभूति होती है।
लगभग चार माह पूर्व परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज का धारकुंडी आश्रम आगमन हुआ था। इस अवसर पर उनके 101वें जन्मदिवस का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे।
स्वामी जी मुंबई से हवाई जहाज द्वारा चित्रकूट पहुंचे, जहां से वे कार द्वारा अपने धारकुंडी आश्रम आए। उनके आगमन पर पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह का माहौल देखने को मिला।
भारत विमर्श सतना मध्य प्रदेश
